(बैतूल) बीज प्रमाणीकरण की लैब में बीज मानक कृषि विभाग की लैब में अमानक, कौन कर रहा फर्जीवाड़ा..!
- बीज उत्पादन और विक्रय में सरकारी विभागों की भूमिका संदिग्ध 
बैतूल(हेडलाईन)/नवल-वर्मा । बीज के खेल में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस बीज को बीज प्रमाणीकरण संस्था अपना टैग जारी कर उसे प्रमाणित कर रही वह बीज कृषि विभाग की लैब में जा कर फेल क्यों हो जाता है? इस सवाल के जवाब को लेकर किसानों का खुला आरोप है कि बीज फेल होने के बाद कार्रवाई और किसानों को क्षतिपूर्ति के नाम पर कृषि विभाग केवल खानापूर्ति करता है । उसी तरह सरकार बीज प्रमाणीकरण संस्था भी प्रमाणीकरण टैग जारी करने प्रक्रिया की केवल कागजी खानापूर्ति करती है। बीज प्रमाणीकरण से लेकर कृषि विभाग तक जो भी होता है उसमे अमानक बीज से केवल किसान का नुकसान होता है। आरोप तो यह है कि बीज उत्पादन और विक्रय का पूरा कार्यक्रम ही संदिग्ध है। यही कारण है कि न तो उत्पादक पर एफआईआर होती और न ही सीड्स प्रोग्राम वाले जिम्मेदार अफसर का कुछ बिगड़ता है। इसलिए बीज में धंधेबाजी का बीजारोपण खूब फलता-फूलता आ रहा है।

- यह है टैग हासिल करने की प्रक्रिया ...
1. जो भी संस्था बीज उत्पादन करेगी वो पहले डीआर के यहाँ पंजीयन कराएगी। फिर उसे कृषि विभाग लाइसेंस जारी करेगा। 
2. कृषि विभाग से लायसेंस लेने के बाद वह बीज प्रमाणीकरण संस्था में अपना पंजीयन करवायेगी। 
3. पंजीयन के बाद संस्था अपना पूरा सीड्स प्रोगाम बना कर कृषि और प्रमाणीकरण संस्था को देगी, इसमें वह किसान का नाम रकबा आदि भी बतायेगी। 
4. सीड्स प्रोग्राम के बाद ब्रीडर, फाउंडेशन या सर्टिफाइड बीज के स्रोत, किस्म और उसकी अंकुरण रिपोर्ट सहित रोग प्रतिरोधकता, प्रति हेक्टेयर उत्पादन क्षमता के प्रमाण प्रस्तुत करेगी। 
5. इस प्रक्रिया के बाद यह बीज उत्पादक रजिस्टर्ड किसानों को बोवनी के लिए दिया जाएगा। 
6. बोवनी के बाद कृषि विभाग के एसएडीओ और बीज प्रमाणीकरण के इंस्पेक्टर निरीक्षण करेंगे। एक फसल में दो निरीक्षण अनिवार्य है। 
7. फसल कटने पर यह उपज समिति को दी जाएगी । फिर वह इस उपज के लिए प्रमाणीकरण टैग के लिए आवेदन करेगा। 
8. बीज प्रमाणीकरण संस्था इस उपज की ग्रेडिंग करवाकर उसके सेम्पल अपनी लैब जांच के लिए भेजेगा। 
9. लैब रिपोर्ट में जो मानक होगा उसकी पौकिंग होगी। हर किस्म के लिए अलग अलग मात्रा तय है। जैसे गेंहू में 40 किलो, चने में 30 किलो। 
10. हर पौकिंग के लिए एक नम्बर के साथ प्रमाणीकरण संस्था की सील के साथ टैग अटैच किया जाएगा। इस टैग वाले बीज को ही बेचा जा सकता है।

- आखिर फेल का फंडा क्या... 
जब बीज प्रमाणीकरण संस्था अपनी लैब में जिस बीज को जांच-परख लेती है तो वह बीज कृषि विभाग की लैब में क्यों फेल हो जाता है? क्या दोनों सरकारी विभाग की लैब में जांच के अलग-अलग मैथड या फार्मूले है ? या टैग जारी करने में ही कोई झोलझाल है? हर सीजन में बीज फेल होता है पर कोई भी इस रहस्य से पर्दा नहीं उठाता है कि एक सरकारी लैब से पास बीज दूसरी सरकारी लैब में क्यों फेल हो जाता है?

- जिले में संस्था का दफ्तर ही नहीं ...
जिले में बीज उत्पादन में करीब दो दर्जन संस्थाएं है जो हजारो हेक्टेयर में हजारो क्विंटल बीज उत्पादन करती हैं। इसके बाद भी बैतूल जिले में बीज प्रमाणीकरण संस्था का कोई दफ्तर नही है। कहने को तो यहाँ तीन इंस्पेक्टर तैनात हैं पर वे कहाँ और क्या करते हैं कैसे करते हैं यह भी किसी को नहीं मालूम। होशंगाबाद में जिले के जिला बीज प्रमाणीकरण अधिकारी का दफ्तर होना बताया जा रहा। सम्भवतः एक अफसर ही तीन जिले डील करता है।

- इनका कहना...
- प्रमाणित बीज कैसे फेल होता है इस पर क्या कहें, कृषि विभाग की लैब पर हम कुछ भी नहीं कह सकते। 
- पीएस पवांर , जिला बीज प्रमाणीकरण अधिकारी ।

- सीड्स प्रोग्राम ही बोगस होता है, जिले में तो कमर्शियल डायवर्टेड जमीन पर भी सीड्स प्रोग्राम होता है, कौन देख रहा। 
      - हितेंद्र देशमुख उन्नत कृषक बैतूल।
नवल-वर्मा-हेडलाईन-बैतूल  14 जनवरी 2021