(बैतूल) अच्छे कर्म कभी नष्ट नहीं होते, ब्याज सहित लौटते हैं बुरे कर्म : आचार्य पुष्कर परसाई , - श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिवस श्रद्धा, भक्ति और आत्मकल्याण का दिया संदेश
बैतूल(हेडलाइन)/नवल वर्मा । गंज स्थित विश्वकर्मा मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिवस कथा के प्रारंभ में आचार्य पुष्कर परसाई जी ने अपने मुखारविंद से विश्वकर्मा बढ़ई समाज द्वारा किए जा रहे सेवा कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि समाज ने कोरोना काल, निर्धन परिवारों के कन्या विवाह, शिक्षा, चिकित्सा, आपातकालीन सहायता तथा महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने जैसे कार्यों में हमेशा अग्रणी भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि इस स्थल को केवल विश्वकर्मा मंदिर नहीं विश्वकर्मा धाम कहा जाना चाहिए, क्योंकि यहां कल्याण, भक्ति और सेवा का महत्व है तथा यहां आने वाले प्रत्येक व्यक्ति का कल्याण होगा।

- कर्म और प्रारब्ध का बताया महत्व...
कथा के दौरान आचार्य परसाई ने कहा कि यदि किसी को रूप की आसक्ति हो तो वह भगवान के रूप की हो और यदि श्रवण की आसक्ति हो तो वह भागवत श्रवण की हो। उन्होंने भीष्म पितामह के 54 दिन बाण शैया पर रहने तथा 51 पूर्व जन्मों के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कर्मों का महत्व समझाया। उन्होंने तत्काल कर्म, संचित कर्म और प्रारब्ध कर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि अच्छे कर्म कभी नष्ट नहीं होते, जबकि बुरे कर्म ब्याज सहित वापस भोगने पड़ते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे लाखों गायों में बछड़ा अपनी माता को ढूंढ लेता है, उसी प्रकार मनुष्य के कर्म भी उसे ढूंढ लेते हैं।
- मृत्यु सत्य है, फिर भी सचेत नहीं होता मनुष्य
कथा में सुखदेव जी महाराज और राजा परीक्षित के प्रसंग का उल्लेख करते हुए आचार्य ने कहा कि जब मनुष्य को सात दिनों में मृत्यु निश्चित होने का ज्ञान हो जाए, तब उसे आत्मकल्याण और ईश्वर चिंतन में लग जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि लोग प्रतिदिन दूसरों को श्मशान जाते देखते हैं, फिर भी स्वयं को अमर समझते हैं। मनुष्य दूसरों की निंदा और बुराई के लिए समय निकाल लेता है, लेकिन आत्मचिंतन के लिए उसके पास समय नहीं रहता। उन्होंने कहा कि जीवन के सौ वर्ष कब बीत जाते हैं, इसका पता ही नहीं चलता, इसलिए व्यक्ति को नारायण स्मरण और आत्मकल्याण की चिंता करनी चाहिए।
- भगवान में मन लगाने के बताए चार उपाय
आचार्य पुष्कर परसाई जी ने भगवान में मन लगाने के चार प्रमुख उपाय भी बताए। उन्होंने कहा कि पहला, व्यक्ति को आसन पर विजय प्राप्त करनी चाहिए ताकि वह अधिक समय तक स्थिर बैठ सके। दूसरा, श्वास पर नियंत्रण जरूरी है, क्योंकि मनुष्य दिन में लगभग 21,600 बार श्वास लेता है और श्वास की संख्या कम होने से आयु बढ़ती है तथा मन नियंत्रित रहता है। उन्होंने अमृत बेला में सुबह 5 बजे उठने की प्रेरणा दी। तीसरा, अच्छे संग में रहने की सीख देते हुए कहा कि जैसे लोगों के साथ व्यक्ति रहता है, वैसे ही संस्कार उसमें आते हैं। चौथा, इंद्रियों पर नियंत्रण आवश्यक है। उन्होंने आंख, नाक, कान, जिह्वा और त्वचा को पंच ज्ञानेन्द्रियां बताते हुए इन पर संयम रखने का संदेश दिया।
- श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़, प्रसादी का हुआ वितरण
तीसरे दिन कथा स्थल पर आकर्षक झांकियां प्रस्तुत की गईं, जिनका श्रद्धालुओं ने भावविभोर होकर दर्शन किया। बड़ी संख्या में श्रद्धालु विश्वकर्मा मंदिर गंज पहुंचकर श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करने पहुंचे। आचार्य परसाई ने श्रद्धालुओं से अपील की कि वे अपने आस-पड़ोस के लोगों को भी कथा में लेकर आएं, जिससे उन्हें भी पुण्य प्राप्त हो और सभी का कल्याण हो सके। कथा उपरांत कमल मालवी महद गांव, हर्ष मालवी और वीरेंद्र मालवी द्वारा प्रसादी का वितरण किया गया।


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