(बैतूल) लाडो अभियान का सफलतम एक दशक , बैतूल के अनिल यादव का बेटियों की पहचान का एक अंतरराष्ट्रीय अभियान : राजीव खंडेलवाल
बैतूल। पुरुष-प्रधान समाज में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार दिलाने के लिए उन्हें सदियों से संघर्ष करना पड़ा है। भारत की सामाजिक, जातीय संरचना, अशिक्षा और परंपरागत सोच के कारण यह संघर्ष और भी कठिन रहा है। यद्यपि समय के साथ महिलाओं ने अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है और अधिकारों की इस लड़ाई में कई सफलताएँ भी प्राप्त की हैं। फिर भी यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि तथाकथित “सभ्य समाज” आज भी महिलाओं को उस मुकाम तक नहीं पहुँचा सका है, जिनकी वे प्राकृतिक, स्वाभाविक जन्म सिद्ध अधिकारिणी हैं।
- ‘‘लाडो अभियान’’ की अवधारणा...
पुरुष की पहचान से पहचाने जाने वाले समाज में बैतूल के निवासी, समाजसेवी एवं एक साधारण पान की दुकान चलाने वाले अनिल यादव (पहलवान) ने एक असाधारण और साहसिक विचार को जन्म दिया...
“समाज की पहचान पुरुष से नहीं, महिला से हो।” इस नई अभिनव सोच ने समाज की *"जड़ जमाई"* हुई सोच को झकझोरने का साहसिक कार्य किया। अनिल ने समाज के सामने यह मूल सोच रखी कि जब घर की धूरी महिला है, तो पहचान सिर्फ पुरुष के नाम से ही क्यों?
इसी सोच के साथ उन्होंने “घर की पहचान बेटी के नाम” अभियान की शुरुआत की, जिसे स्नेह पूर्वक “लाडो अभियान” नाम दिया गया। *"लाडो"* मतलब लाडली, मतलब परिवार के प्रत्येक सदस्य का *"प्रिय"* होना। तब योजना भी उतनी प्रिय होगी, यही सोचकर योजना का नाम *"लाडो"* रखा गया।
इस अभियान का शुभारंभ 8 नवंबर 2015, उनकी बेटी आयुषी यादव के जन्मदिन से हुआ।
आज यह अभियान अपने 10 वर्ष (3650 दिन) पूर्ण कर चुका है।
*"स्थानीय पहल से राष्ट्रीय-वैश्विक पहचान तक।"*
आदिवासी बहुल बैतूल जिले से शुरू हुआ यह अभियान आज—
देश के 28 राज्यों तक पहुँच चुका है।
मध्य प्रदेश के 27 जिलों में सक्रिय है।
अकेले बैतूल जिले के 135 गाँवों में अब तक 3900 से अधिक बेटियों के नाम की नेम प्लेट घरों पर लगाई जा चुकी हैं।
यह केवल नेम प्लेट लगाने का कार्य नहीं, बल्कि समाज की सोच का चेहरा बदलने का प्रयास है। यह अभियान आज बेटियों को सामाजिक पहचान, सम्मान और स्वाभिमान देने का प्रतीक बन चुका है।
गर्व की बात है कि यह अभियान अमेरिका, दुबई और लंदन तक भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है।
- ‘‘संघर्ष’’ का पर्याय... अनिल यादव"...

कहावत है जो खुद पर लागू करें वही दूसरों को समझ सकता है। कोई भी सामाजिक आंदोलन तभी सफल होता है, जब उसका प्रारंभ स्वयं से किया जाए।
अनिल यादव ने इस सिद्धांत को अपने जीवन में उतारते हुए अभियान की शुरुआत अपने घर से की। रास्ता आसान नहीं था
असंख्य उपहास, शंकाओं और आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। न तो कदम रोके, न हो हौसले टूटने दिए और निरंतर आगे बढ़ते रहे। यह अभियान देश के यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी की “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” योजना के उद्देश्य को जमीनी स्तर पर घर-घर तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन गया।
- 10 वर्षों का अनुभव और सामाजिक प्रभाव व परिवर्तन...
जब अनिल यादव से पूछा गया कि इस दस वर्षीय यात्रा में उन्हें किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, तो उन्होंने बताया कि...
किसी ने कहा, “इससे क्या बदलेगा?” इससे क्या फर्क पड़ेगा?
किसी ने आशंका जताई कि “बेटियों के नाम से लोग पुकारेंगे तो असहजता होगी।”
किसी ने इसे समय की बर्बादी बताया।
यह ऊंट के मुंह में जीरा है।
लेकिन दृढ़ निश्चय और अटूट विश्वास के साथ उन्होंने इन सभी बातों को नजरअंदाज किया। समय नहीं है सिद्ध कर दिया या मुहिम रेट पर पानी नहीं बल्कि पत्थर पर लकीर साबित हुई।
- परिणाम आज सबके सामने है...
समाज में बेटियों को सम्मान और बराबरी का दर्जा मिलने लगा है। समाज में बेटियों को आंख उठाकर देखने का अवसर मिल रहा है।
घरों पर दादा या पिता के स्थान पर बेटी व महिलाओं के नाम की नेम प्लेट लगने लगी है। प्रतिष्ठानों के नाम बेटियों के नाम पर रखे जाने लगे हैं। बेटियों के जन्म पर उत्सव मनाने की परंपरा बढ़ी है। माता-पिता बेटियों के भविष्य को लेकर अधिक सजग और सकारात्मक हुए हैं।
इस अभियान की सफलता में लाडो फाउंडेशन, बेटियों के माता-पिता तथा मीडिया एवं पत्रकार बंधुओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है जो निश्चित रूप से बधाई के पात्र हैं।
- "एक अपील"...
इस अवसर पर खासकर बैतूल जिले के नागरिकों से एक विशेष अपील जरूर इसलिए भी करना चाहता हू कि यह बिल्कुल ही मौलिक, अभिनव योजना है जिसे बैतूल का नाम सिर्फ जिले, प्रदेश या देश में ही नहीं बल्कि विश्व में भी किया है।
अब तक लगी 3590 नेम प्लेटों में से लगभग 2000 बैतूल जिले में हैं।
18 लाख से अधिक जनसंख्या व 3:50 लाख से अधिक परिवार वाले जिले में यह संख्या और द्रुत गति से बढ़नी चाहिए
“दीया तले अंधेरा” नहीं होना चाहिए।
यह एक अत्यंत सरल, कम खर्चीली, किंतु गहन सामाजिक परिवर्तन लाने वाली पहल है।
प्रत्येक नागरिक का सामाजिक दायित्व है कि
हर घर के सामने बेटी या महिला के नाम की नेम प्लेट लगाकर हम न केवल सामाजिक जिम्मेदारी निभाएंगे बल्कि एक मौन क्रांति का हिस्सा भी बनेंगे।
विवाह के बाद घर आने वाली बहू को भी “घर की बेटी” मानते हुए उसका नाम सम्मानपूर्वक प्रदर्शित किया जाए।
इससे न केवल नई बहू को सामाजिक स्वीकृति मिलेगी, बल्कि उसके आत्मविश्वास में भी वृद्धि होगी—जो परिवार और समाज दोनों के लिए हितकारी सिद्ध होगी।
तेजी से पाश्चात्य संस्कृति की ओर बढ़ते समाज और कमजोर होते संयुक्त हिंदू परिवार की पृष्ठभूमि में, “लाडो अभियान” परिवार और सामाजिक मूल्यों को सहेजने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।
लेखक : राजीव खंडेलवाल,

वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष नगर सुधार न्यास बैतूल।


ईरान तनाव के बीच चीन की नई चाल: PoK के पास नई काउंटी बनाने पर भारत का कड़ा विरोध
लखनऊ पहुंचे विनोद तावड़े, योगी आदित्यनाथ से मुलाकात आज—कैबिनेट विस्तार की अटकलें तेज
मोनालिसा लापता: पति फरमान ने वीडियो जारी कर लगाई मदद की गुहार
ट्रंप के बयान से दहला बाजार: सेंसेक्स 1600 अंक लुढ़का, निफ्टी भी बड़ी गिरावट में
भोपाल से पाकिस्तान तक गिद्ध की उड़ान: 7 दिन में 1274 KM का सफर, जानें क्यों छोड़ा गया