कैंसर के आकड़े सामने है, लेकिन  कैंसर होने के कारणों पर क्या काम है? शून्य। 
सारे विषय  महत्वपूर्ण है, बस धरती, नदी प्रकृति कैंसर  कारणों पर न कोई आंदोलन है, न विचार और संवाद है.?  
क्या टी वी पर कभी  आपने इन मुद्दों पर  पार्टियों नेताओं के बीच बहस चो _चो   होते देखी और सुनी है? नहीं। मंदिर और मंदिर चढ़ावा मुख्य विषय है। मंदिर में  चढ़ावा है और कैंसर पीड़ित उपचार के लिए मोहताज है। मंदिर में चढ़ावा  किसलिए?  आखिर क्यों? जब हम सब मिलकर चोरी करवाने के लिए मंदिर में चढ़ावा चढ़ा सकते है तो क्या हम धरती पर एक एक  वृक्ष लगाने के लिए पैसे नहीं  खर्च कर सकते है? हम मंदिर में चढ़ावा चढ़ाने के लिए होड़ मचा रहे हैं, लेकिन दस रूपये का कपड़े का  थैला  खरीदकर बाजार जाने  में  हमे शर्म आ रही हैं? मानो ऐसा लगता है  भगवान मंदिर में चढ़ावे की रकम  देखकर ही  केवल भक्तों पर प्रसन्न होता होगा और  आशीर्वाद देता होगा। दुनिया का सबसे बड़ा दानवीर कर्ण ने तो मंदिर में चढ़ावा नहीं चढ़ाया , उसने तो    अपने  शरीर पर धारण किए सोने के कुंडल और कवच अपनी मां के चरणों में    अर्पित कर दिए थे, कर्ण ने तो  अपनी माँ से नहीं कहा कि मां मैं तुझे  सोने के कुंडल  कवच नहीं दूंगा , भगवान के मंदिर में  ही चढ़ावा दूंगा ऐसा तो नहीं हुआ, लेकिन कर्ण दुनिया में दानवीर कर्ण के नाम से विख्यात है! आज तक मंदिर में  पैसे चढ़ाने वाला कौन दानवीर कहलाया? 
 भगवान की बनाई साक्षात प्रकृति की बर्बादी हमे स्वीकार है, जिसके चलते इंसान कैंसर से तड़प तड़प कर मर  रहा है  हमे स्वीकार है,। सरकार मंदिर में पैसे गिनने के लिए ट्रस्ट बना सकती हैं लेकिन पॉलीथिन प्लास्टिक डिस्पोजल को रोकने के लिए पब्लिक कमेटी नहीं बना सकती हैं। चौक चौराहों के सौंदर्यीकरण के लिए छाता लगाकर प्रशासनिक अधिकारी   भ्रमण कर सकते है ,लेकिन  शहर में पॉलीथिन प्लास्टिक डिस्पोजल के ढेर देखने और उसे हटवाने   के लिए प्रशासनिक अधिकारियों के पास भ्रमण कर वास्तविकता से रूबरू होने और देखने का समय नहीं है। हम करोड़ों रूपये  से चौक, सड़के  बनवा सकते है लेकिन हर जिला मुख्यालय पर फल सब्जी की टेस्टिंग के लिए एक लैब नहीं खुलवा सकते है।  जहां सब्जी फलों की जाँच होकर पता चल सके कि सब्जी फल रसायन मुक्त है और जैविक है। हमारे पास  महाविद्यालयों में अपने अपने को उपकृत करने के जन भागीदारी समितियों का कॉन्सेप्ट है लेकिन जन भागीदारी से धरती से पॉलीथिन प्लास्टिक डिस्पोजल हटाने का  कॉन्सेप्ट नहीं है, नदी  की अविरलता के लिए कॉन्सेप्ट नहीं है। 
हमारे पास नगर निगम बनाने के लिए विचार और विस्तृत वृहद कार्ययोजना है ,लेकिन नगर पॉलीथिन प्लास्टिक डिस्पोजल मुक्त हो जाएं इसके लिए कोई   कार्ययोजना मिशन  नहीं है । बस ठेका दे दिया , बिल निकालो पैसे बनाओ । पॉलीथिन प्लास्टिक डिस्पोजल जहां के तहां।
 नगर निगम  बन  जाएगा तो क्या मां माचना नदी अविरलता से बहने लगेगी? नगर निगम  बन जाने से क्या धरती मां पॉलीथिन प्लास्टिक डिस्पोजल मुक्त हो जाएगी? क्या नगर निगम बन जाने से बैतूल कैंसर मुक्त हो जाएगा? क्या नगर निगम बन जाने से माता बहनों  का सम्मान सुरक्षित हो जायेगा? बैतूल पानीदार हो जाएगा? 
नगर निगम  बनने से केवल बजट मिलने लगेगा जो पानी की तरह बहाया जायेगा, अध्यक्ष  महापौर  के भारीभरकम शब्द से पुकारे जाने लगेगा, पार्षद सभासद हो जायेंगे, मुख्य नगर पालिका अधिकारी की जगह आयुक्त का बोर्ड कार्यालय में लटकने लगेगा। खेड़ी से बैतूल ,बैतूल से खेड़ी  ई बस सर्विस शुरू हो जायेगी। बजट बड़े हो जाएगा, ख्वाब बड़े हो जायेंगे, राजनीति   शबाब पर होगी, जितना बड़ा बजट  उतनी राजनैतिक  उठापटक किंतु जिंदगी छोटी हो जाएगी, प्रकृति मर जाएगी, नगर निगम  अस्तित्व में आ जायेगा, नदिया अपना अस्तित्व खो देंगी। अलगू चौधरी शेख जुम्मन की पंचायते अपना अस्तित्व खो देंगी और नगर निगम की  अस्तित्व  में आ जायेगा। वह सारी बुराइयां इस शहर और गांवों में प्रवेश कर जाएगी  जो  बड़े शहरों कि त्रासदी है, जिससे आज तक  मेरा शहर    महफूज़  है। मुझे बड़े ख़्वाब नहीं, जमीनी हकीकत में मेरी प्रकृति , मेरी नदी , मेरी धरती , मेरी गौ माता स्वस्थ और प्रसन्न चाहिए, मुझे राम नहीं, राम की शबरी चाहिए, मुझे  राम का मंदिर नहीं राम को गंगा मैया पार    कराने वाला   केवट चाहिए, मुझे नगर निगम नहीं, कैंसर मुक्त, पॉलीथिन प्लास्टिक डिस्पोजल मुक्त पानीदार छायादार बैतूल चाहिए।
हेमंत चंद्र दुबे बबलू...