बैतूल(हेडलाइन)/नवल वर्मा। मध्यप्रदेश में पट्टे की जमीन और अनुसूचित जनजाति वर्ग की भूमि के अंतरण (बिक्रय) से जुड़े मामलों में अब मनमाने फैसलों पर लगाम लगेगी। राजस्व मंडल, मध्यप्रदेश ने प्रदेश के सभी कलेक्टरों को सख्त निर्देश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि भूमि विक्रय अनुमति के मामलों में केवल परंपरागत धारणाओं या मौखिक व्याख्याओं के आधार पर आवेदन निरस्त नहीं किए जा सकते। हर प्रकरण में कानून, दस्तावेज, वास्तविक तथ्यों और परिस्थितियों का परीक्षण कर ही विधिसम्मत एवं कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।
राजस्व मंडल के अध्यक्ष अनिरुद्ध मुखर्जी द्वारा 13 मई 2026 को जारी परिपत्र में कहा गया है कि मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 165(6) एवं 165(7-ख) के अंतर्गत आने वाले मामलों में कई जिलों में अलग-अलग तरीके से निर्णय लिए जा रहे हैं। अनेक मामलों में आवेदनों को पर्याप्त कारण बताए बिना अस्वीकार कर दिया जाता है, जिसके चलते आवेदकों को अपील के लिए राजस्व मंडल या न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है। इससे न केवल न्यायालयों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है, बल्कि आम नागरिकों का समय और पैसा भी व्यर्थ होता है।

- हर पट्टे की जमीन एक जैसी नहीं, पहले होगी पूरी जांच...
परिपत्र में स्पष्ट किया गया है कि कई मामलों में अधिकारी यह मान लेते हैं कि संबंधित भूमि शासन द्वारा पट्टे पर दी गई है, जबकि वास्तविकता में अनेक आदिवासी परिवारों के पास निजी भूमिस्वामी अधिकार वाली भूमि होती है। इसलिए केवल अनुमान के आधार पर आवेदन खारिज करना कानून की भावना के अनुरूप नहीं है। प्रत्येक प्रकरण में भूमि का स्वरूप, दस्तावेज और संबंधित अभिलेखों का अलग परीक्षण करना अनिवार्य होगा।

- इन बिंदुओं पर करना होगा परीक्षण...
राजस्व मंडल ने कलेक्टरों को निर्देश दिए हैं कि अनुमति देने या अस्वीकार करने से पहले यह सुनिश्चित करें कि भूमि खरीदने वाला व्यक्ति कौन है, भूमि का उपयोग किस उद्देश्य से किया जाएगा, क्या इससे अनुसूचित क्षेत्र के लोगों के सामाजिक, सांस्कृतिक या आर्थिक हित प्रभावित होंगे, विक्रेता को उचित बाजार मूल्य मिल रहा है या नहीं तथा कहीं पूरा सौदा फर्जी, बेनामी या संदेहास्पद तो नहीं है।

- 5 एकड़ सिंचित और 10 एकड़ असिंचित’ की बाध्यता नहीं...
परिपत्र का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि राजस्व मंडल ने वर्षों से प्रचलित उस धारणा को भी गलत बताया है, जिसमें यह माना जाता रहा कि पट्टे की जमीन बेचने के बाद विक्रेता के पास कम से कम 5 एकड़ सिंचित या 10 एकड़ असिंचित भूमि बचना अनिवार्य है। मंडल ने स्पष्ट किया है कि यह प्रावधान धारा 165(7-घ) के अंतर्गत कुर्की अथवा न्यायालय के आदेशों के पालन से जुड़े मामलों पर लागू होता है, न कि पट्टे की भूमि विक्रय अनुमति के मामलों पर। हालाकि, कलेक्टर यह जरूर जांचेंगे कि जमीन बेचने का उद्देश्य वास्तविक और आवश्यक है या नहीं? यदि विक्रय बच्चों की शिक्षा, गंभीर बीमारी, विवाह या अन्य आवश्यक कारणों से किया जा रहा है तो उसका परीक्षण किया जाएगा। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि भूमि बेचने के बाद विक्रेता और उसके परिवार के पास जीवन-यापन के पर्याप्त साधन उपलब्ध रहेंगे या नहीं।

- पारदर्शिता बढ़ेगी, विवाद होंगे कम...
राजस्व मंडल ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि धारा 165(6) और 165(7-ख) के तहत आने वाले प्रत्येक प्रकरण में तथ्यों, कानूनी प्रावधानों और संबंधित परिपत्रों का समुचित परीक्षण कर विवेकपूर्ण, स्पष्ट और कारणयुक्त आदेश पारित किए जाएं। माना जा रहा है कि इस आदेश से पूरे प्रदेश में भूमि विक्रय अनुमति की प्रक्रिया एक समान होगी, अनावश्यक मुकदमेबाजी कम होगी, पात्र आवेदकों को राहत मिलेगी और प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता तथा जवाबदेही भी बढ़ेगी।
नवल वर्मा हेडलाइन बैतूल 12 जुलाई 2026