आखिर धरती, नदी, गौ, प्रकृति को हम कैसे बचाएंगे..! जब जिला विकास समिति स्वयं प्लास्टिक की पानी बोतलों को सजाकर बैठके करेगी..? : हेमन्त चंद्र (बबलू) दुबे
आज के विकास की परिभाषा बजट है, समितियां है, मनोनयन है। आज का विकास मानव प्रकृति केन्द्रित न होकर बजट केन्द्रित, समिति केंद्रित , धन्यवाद केंद्रित , अभिनंदन केंद्रित, आभार केंद्रित, कमाने के साधन केंद्रित , प्रशंसा केंद्रित हैं। आज विकास की गंगा के नाम पर पैसे की गंगा सरकार के खजानों से निकलती है ,जिसके लिए एक ओर तरीका सरकार ने ढूंढा है _जिला विकास समिति । अब विकास रूपी जिन्न की बोतल से एक और जिन्न निकालकर बाहर लाया गया है। आखिर बैतूल में समितियां किसलिए और किस अर्थ की ? जब सारे निर्णय लेने के लिए यहां विकराल नेतृत्व मौजूद है, जिसमे सारी योजनाएं , सारे विचार सब कुछ समाहित है, तब क्या ये समितियां केवल शो पीस या उस विकराल रूपी नेतृत्व की बातों को केवल मुहर लगाने वाली साबित नहीं होगी। बैठकों में सिर्फ एक ही स्वर सुनाई देगा एक दूसरे की प्रशंसा? अधिकारी राजनेताओं की प्रशंसा करेंगे और राजनेता अधिकारयों की और समिति सदस्य इस प्रशंसा को सुन अति प्रसन्न होंगे। राजनेता रूपी योगी कर्मयोगी रूपी अधिकरियों की प्रशंसा करेंगे, और कर्मयोगी योगी की प्रशंसा करेंगे। क्यों डॉक्टर ये ठीक है अब डॉक्टर शरीर के विकास को समझने वाला, शरीर में रक्त की कमी को समझने वाला क्या बोलेंगे। जी !अच्छा विकास है? जिला विकास समिति दरअसल में जिला हां में हां मिलाओ प्रशंसा समिति है जो बस केवल विकराल नेतृत्व और अधिकारियों की सारी विकास योजनाओं पर अपनी सहमति प्रकट कर अभिनंदन,आभार , प्रशंसा ही व्यक्त करते हुए दिखाई पड़ेगी। प्रभारी मंत्री, कलेक्टर महोदय ,जिला पंचायत सी ई ओ, सारे विभाग के विभागाध्यक्ष पानी की प्लास्टिक की बोतलों से सजी गोल टेबल के चारों ओर सामने रखकर करोड़ों की मुंगेरी लाल के हसीन सपनों की विकास की योजनाओं के सब्जबाग दिखाने प्रारंभ करवा देंगे।
जनता इसे देख गहरी लम्बी सांस लेते हुए विकास के सपने देखते देखते लाडली बहना के पैसे खाते में आते देखते सोते रहेगी।
हमारे पास इंसान कि योग्यता का कोई अर्थ नहीं है, योग्यता, विद्वता, ज्ञान को विकास की समिति में लाकर दफन कर दिया जाता है , योग्यता, अथाह ज्ञान का भंडार जो किसी विश्वविधालय के कुलपति बनने के लायक है , वह योग्यता जिले के निर्माण कार्यों में स्वीकृति और हां में हां मिलाने के प्रशंसा करने तक सीमित कर दी जाती है।
हमे सुनियोजित समन्वित विकास के प्रतिदिन शहर में दर्शन हो रहे है। पहले सड़क बन जाती हैं , फिर पेविंग ब्लॉक लगा दिए जाते है और फिर इतनी चौड़ी नाली का निर्माण शुरू किया जाता हैं, वह नाली नहीं नाला दिखाई पड़ता है,सुंदर , व्यवस्थित बनी स्वतंत्रता संग्राम सैनानी दीपचंद गोठी मार्ग पुनः अस्त व्यस्त ध्वस्त होने लगता हैं, हम तीन विभागों बिजली, नगरपालिका , लोक निर्माण के बीच समन्वय स्थापित नहीं करवा पाएं और विशाल जिला विकास समिति का गठन कर विकास को विक्रम बेताल की भांति पीठ पर लादकर घूमने लगे।
नदियों का क्या होगा? कुएं कैसे पुनर्जीवित होंगे? धरती का क्या होगा? धरती नदी कैसे पॉलीथिन प्लास्टिक मुक्त होगी ? विकास के नाम पर केवल बजट के साथ प्रकृति से खिलवाड़ को हम कब बंद कर पाएंगे? क्या विकास का अर्थ निर्माण कार्य ही होगा? आज विकास में सरकार कौन सी सहमति या जन भागीदारी सुनिश्चित करती हैं । विकराल रूपी नेतृत्व विकास की योजनाओं का भारी भरकम बजट स्वीकृत करवा सीधे भूमिपूजन करने पहुंच जाता है और फिर बता दिया जाता है कि दो करोड़ का स्वीकृत बजट बढ़ाकर आठ करोड़ करवा दिया गया है। विकास का पैमाना आठ करोड़ रुपए है , न कि विकास के कार्य की सोच , गुणवत्ता का आधार ?
मेरे पास वर्षों से तेंदूपत्ता नीति है, बीड़ी पियो, लंग कैंसर को आमंत्रण दो, लेकिन आज तक मैं पत्तल डोना नीति नहीं बना सका मैंने पत्तल डोना पर बात बहुत की लेकिन किया कुछ नहीं? मेरे पास शानदार शराब नीति है , किन्तु मैं प्रदेश कि महुआ नीति नहीं बना सका। मैं महुआ फूल के लिए समर्थन मूल्य निर्धारित नहीं कर सका।

खैर जिला विकास समिति के गठित सभी सदस्य अपने अपने विषयों के जानकार और महारथी हैं, जो अनेकों समितियों संगठनों में पूर्व से ही नामांकित और पदों पर आसीन होने के कारण बैठकों में मंत्रियों कलेक्टर नेताओं के साथ बैठने का लम्बा अनुभव रखते है,जिसका लाभ निश्चित ही बैतूल के विकास में स्पष्ट रूप से दिखाई देगा।आशा की जाती हैं कि बैतूल का विकास पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्मक मानवतावाद के सिद्धांत, गांधी की ग्राम स्वराज की अवधारणा पर मानवीय विकास, प्रकृति आधारित विकास पर जोर देगा,हम सभी नागरिक जिला विकास समिति की बैठकों में गोल टेबल पर लगे माइक के साथ पानी की प्लास्टिक की छोटी छोटी बोतलों को रखी देख विकास को होते देखेंगे। बस विकास होना चाहिए, बजट आना चाहिए, टेंडर निकलना चाहिए।
कलेकटर साहब से निवेदन है विकास तो होगा जब आप सब विद्वान समिति में है तो विकास को कोई नहीं रोक सकता, वह अवश्य होगा किंतु सर स्टील के पानी के गिलास और पानी के जग खरीदने की कृपा करें ताकि हम अपनी धरती मां नदी मां प्रकृति को बचाने के लिए सार्थक सन्देश दे सके, जब पानी की प्लास्टिक बोतलों के खरीदने का बजट उपलब्ध है तो स्टील के गिलास ओर जग खरीदने का बजट भी उपलब्ध तो हो सकता हैं न सर!
नवगठित विकास समिति के सभी सदस्यो को बहुत बहुत शुभ कामनाएं...

@ हेमंत चंद्र दुबे बबलू


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