'लाल सलाम' का आखिरी सलाम: अब बंदूकें नहीं, भरोसे की बुनियाद पर होगा भविष्य
छत्तीसगढ़ का नाम जब भी सामने आता है, अक्सर उसके साथ नक्सलवाद की छवि जुड़ जाती है. लाल सलाम, जंगलों में सन्नाटा, गोलियों की गूंज और वीरान होते गांव. ये तस्वीरें बरसों से बस्तर जिले की पहचान बन चुकी थीं, लेकिन अब हवा का रुख बदल चुका है. देश के अन्य जिलों की तरह ही बस्तर जिले से नक्सलवाद का खत्म हो चुका है. केंद्र सरकार ने अब बस्तर जिले को नक्सल प्रभावित जिले की श्रेणी से बाहर कर दिया है. ऐसा इसलिए बताया जा रहा है कि पहले जिस बस्तर जिले में दर्भा और लोहंडीगुड़ा में माओवादियों का जमावड़ा हुआ करता था, अब वहां सीआरपीएफ आदि कैंप खुलने और जवानों की कड़ी मेहनत से नक्सल का प्रभाव समाप्त कर दिया है.
2025 की मई में एक ऐतिहासिक पल आया, जब केंद्र सरकार ने बस्तर जिले को ‘नक्सल मुक्त’ घोषित कर दिया. ये वही इलाका है, जहां कभी कदम-कदम पर माओवादी संगठन की पकड़ थी. अब बस्तर एलडब्ल्यूई (Left Wing Extremism) प्रभावित जिलों की सूची से बाहर हो चुका है. यह महज एक सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि बस्तर के हर गांव, हर आदिवासी, हर परिवार के लिए उम्मीद की एक नई सुबह है.
अबूझमाड़ की वो रात, जिसने इतिहास बदल दिया
21 मई 2025 को नारायणपुर जिले के घने जंगलों में सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच एक भीषण मुठभेड़ हुई. इसे माओवाद के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई माना जा रहा है. मुठभेड़ में 28 नक्सली मारे गए, जिनमें माओवादी संगठन का महासचिव बसवराजू भी शामिल था. जिस पर कई राज्यों सहित 10 करोड़ रुपए का इनाम था. माना जा रहा है कि इस एक ऑपरेशन ने नक्सल आंदोलन की रीढ़ तोड़ दी.
हथियार छोड़, शांति की राह पर लौटे कदम
इस मुठभेड़ के बाद से नक्सलियों के आत्मसमर्पण की बाढ़ सी आ गई है. अब तक 84 नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं. हाल ही में सुकमा के बटालियन नंबर-1 के क्षेत्र से 18 नक्सलियों ने सरेंडर किया, जिनमें से 4 हार्डकोर माने गए, 2 नक्सलियों पर ₹8 लाख का इनाम था. तेलंगाना के भद्राद्री कोठागुडेम जिले में भी 64 माओवादी हथियार डाल चुके हैं. इनमें से कई छत्तीसगढ़ की सीमा से सटे गांवों से थे, जहां कभी नक्सलियों का वर्चस्व था.
पॉलिसी नहीं, बदलाव की प्रक्रिया है ये पुनर्वास नीति
सरेंडर करने वाले इन नक्सलियों को राज्य सरकार की पुनर्वास नीति से प्रेरणा मिली है. इलवट पंचायत योजना और नियद नेल्ला नार योजना का इन पर सबसे ज्यादा असर रहा है. ये योजनाएं महज सरकारी दस्तावेज नहीं, बल्कि शांति और सम्मान से जीने की दिशा में पहला कदम हैं. सरकार उन्हें केवल सुरक्षा नहीं दे रही, बल्कि एक नई पहचान भी दे रही है. इसके जरिए मिलने वाली बड़ी सुविधाओं में कौशल विकास, घर, खेती की जमीन और एक स्थिर जीवन शामिल है.
अब सवाल उठता है- अब आगे क्या?
बस्तर ने एक लंबी और दर्दनाक लड़ाई लड़ी है, लेकिन जीत की शुरुआत अब हो चुकी है. अब चुनौती है इस भरोसे को बनाए रखना, युवाओं को शिक्षा, रोजगार और सम्मान की राह पर आगे बढ़ाना. बस्तर की कहानी अब बंदूकों की नहीं, बहाली की है. यह सिर्फ नक्सलियों की वापसी नहीं, बल्कि भरोसे की घर वापसी है.


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